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'वर्ल्ड बुक-डे': जिंदगी जीने का सलीका सिखातीं है किताबें!


'वर्ल्ड बुक-डे': जिंदगी जीने का सलीका सिखातीं है किताबें!

प्यार हो या खुशी का पल, दुख हो या फिर उदासी का क्षण, किताबें हमेशा साथ रहती हैं. दोस्त भले ही साथ छोड़ दें, लेकिन किताबें हमेशा सच्ची दोस्त होती हैं. किताबें हमेशा ही इन्सान की सच्ची साथी रहेंगीं. इन्हीं किताबों का आज खास दिन यानी 'वर्ल्ड बुक-डे' है. 

'वर्ल्ड बुक-डे' का इतिहास -
वर्ल्ड बुक डे हर साल 23 अप्रैल को यूनेस्को (यूनाइटेड नेशन एजुकेशनल साइंटिफिक एंड कल्चरल ऑर्गनाइजेशन) द्वारा मनाया जाता है. इसकी शुरुआत 23 अप्रैल 1995 को हुई थी. वर्ल्ड बुक डे का मुख्य उद्देश्य रीडिंग, पब्लिशिंग और कॉपीराइट को लोगों के बीच प्रमोट करना है. एक तरह से इंसान और किताबों के बीच की दूरी को कम करने के लिए वर्ल्ड बुक-डे मनाया जाता है.

'जिंदगी क्या है?' किताबों से सीखें - 
अब युवा पीढ़ी करियर ओरियंटेड हो गई है. इसके चलते वह सिर्फ वहीं किताबें पढ़ना ज्यादा पसंद करती है, जो उनके करियर को बेहतर बना सकें. लेकिन अगर आप अपना संपूर्ण विकास चाहते हैं तो उन किताबों, साहित्य को पढ़ें जो आपके भीतर सोचने की प्रवृत्ति पैदा करें. जो आपकी इमेजिनेशन पावर को और मजबूत करें. समाज को समझने के लिए एक अच्छे साहित्य को पढ़ना भी जरूरी है.

भावनाओं को समझाती है किताबें -
किताबें न सिर्फ लोगों को सीख देती है बल्कि भावनाओं का भी विस्तार करती हैं. हर भाषा के साहित्य में कुछ एक ऐसे उपन्यास और किताबें हैं, जो भावनाओं उच्चस्तर पर ले जाती हैं. भावनाएं इंसान को पूर्ण बनाती है और यह संपूर्णता पुस्तकें ही लाती हैं.

युवाओं को क्या पढ़ना चाहिए -
आजकल सोशल मीडिया का जमाना है. हर व्यक्ति खुद को लेखक और कवि के तमगे से नवाज देता है. युवाओं को सोशल मीडिया पर प्रतिक्रियाओं से प्रेरित होने की बजाए किताबों की दुनिया में कदम रखना चाहिए. सतही ज्ञान से बचना चाहिए. 

आजकल के यूथ हार्डकॉपी के बजाए पीडीएफ पढ़ने में ज्यादा दिलचस्पी दिखाते हैं. सस्ती किताबें यूथ को आसानी से परोसी जा रही हैं. वे इसे पढ़ भी रहे हैं, जो सिर्फ एंटरटेनमेंट के लिए अच्छी है लेकिन कोई सीख नहीं देती. ऐसी किताबों को पढ़ने से बचें.

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